सावन मास के अंतिम सोमवार पर पूरे देश भर में शिव भक्तों ने भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना की और उनके प्रति भक्ति का जोर दिया। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक के मंदिर और शिवालय दर्शन के लिए भक्तों से भर गए। सभी ने खुद व्रत और शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, दूध, भस्म और पुष्प अर्पित कर एक पूर्ण भक्ति का महत्व समझाया।
अंतिम सोमवार का महत्व:
हिन्दू पंचांग के अनुसार, सावन के महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और सोमवार का दिन भगवान शिव जी की पूजा में अत्यंत फलदायक माना जाता है। सावन के अंतिम सोमवार को विशेष रूप से जीता जाता है क्योंकि इस में मान्यता है कि शिव जी के इस दिन का व्रत रखने वाला शिव भक्त शिवजी का मनोकामना सिद्ध कर पाता है। इसके साथ ही उसे मोक्ष और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पूरे देशभर शिवालयों, शिव मंदिरों में उमड़ पड़ा सैलाब:
काशी का विश्वनाथ मंदिर, उज्जैन का महाकालेश्वर, देवघर का बैद्यनाथ धाम, केदारनाथ और रामेश्वरम मंदिर भी हर एक प्रमुख शिवालय में उल्लास से भरा था। लाखों श्रद्धालु, गुरुवार को गंगा जल, दूध और पंचामृत से भोलेनाथ का अभिषेक कर रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय मंत्रों का जाप करते दिखे।
कांवर यात्रा का चरमोत्कर्ष:
सावन का महीना कांवर यात्रा का महीना बन चुका है। लाखों कांवरिए उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों से गंगाजल लेने के लिए हरिद्वार, देवघर, सुल्तानगंज और गंगोत्री के तीर्थ केंद्र पहुँच गए।
यह यात्रा अंतिम सोमवार को अपने चरम पर पहुंचती है। श्रद्धालु बिना थके भोलेनाथ तक जल अर्पित करने का संकल्प लेते हैं, भले ही पैरों में छाले क्यों न हों। इसके लिए प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थानों ने मार्ग में सेवा शिविर, मेडिकल सुविधाएं और जल वितरण केंद्र स्थापित किए।
पूजा-पाठ और संगीत आयोजन:
कांवर यात्रा के दौरान जगह-जगह रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन आयोजित किए गए। बिहार और पटना में संगीतकारों ने भक्ति रस से सराबोर कार्यक्रम प्रस्तुत किए। पूर्णिया की गंध टोली ने भी एक भव्य कांवर यात्रा आयोजित की जिसमें भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया गया।
प्रशासन की मुस्तैदी:
हरिद्वार में प्रशासन ने एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं की कांवर यात्रा को सुरक्षित संपन्न कराने के लिए 5000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की। मेडिकल इमरजेंसी के लिए हेलीकॉप्टर सेवा भी तैनात थी।
धार्मिक एकता का प्रतीक:
इस अवसर पर विभिन्न जातियों, संप्रदायों और भाषाओं के लोग एक उद्देश्य से एकत्र हुए—शिव भक्ति। दक्षिण भारत के भक्त ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते दिखे, वहीं उत्तर भारत में ‘बोल बम’ के जयकारे गूंजते रहे।
श्रद्धालु यही संदेश दे रहे थे कि भगवान शिव सबके हैं—वे निराकार भी हैं और साकार भी, सरल भी हैं और सर्वशक्तिमान भी।
शांति की अपील:
प्रशासन और धार्मिक संगठनों ने आमजन से संयम बनाए रखने और पर्व को शांति से मनाने की अपील की। कुछ स्थानों पर अफवाहों के चलते हल्की गड़बड़ी की आशंका रही, जिसे प्रशासन ने तुरंत काबू में कर लिया।
कथा, आस्था और परंपरा की गहराई:
मान्यता है कि सावन के महीने में ही भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष का पान कर संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की थी। इसलिए यह महीना उनके त्याग और करुणा का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस दिन वस्त्र, फूल और जल चढ़ा कर भगवान से सुख-शांति और कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं।
निष्कर्ष:
सावन का अंतिम सोमवार केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतीक है। इस दिन की भक्ति, सेवाभाव और एकजुटता देश को अध्यात्म की शक्ति से जोड़ती है।
शिव के निराकार और साकार स्वरूप, उनके सहज हृदय और अद्भुत शक्ति से भक्तों को एक गहरी आंतरिक शांति का अनुभव होता है। जब लाखों लोग एक साथ भगवान शिव की आराधना में लीन होते हैं, वह क्षण केवल पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सकारात्मक ऊर्जा का संकल्प बन जाता है।


